अजमल बनाम कांग्रेस: असम की मुस्लिम आबादी के बीच जारी वफादारी की जंग
चुनावी लड़ाई अब बस राजनीतिक दलों के बीच नहीं है — यह पहचान, वफादारी और betrayal की भी है। असम में बदरुद्दीन अजमल और उनकी पार्टी AIUDF इस समय अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही हैं। कहां की लड़ाई? विधानसभा की सीटों पर। लेकिन किसके खिलाफ? सत्तारूढ़ BJP के खिलाफ तो वे ज़हर उगलते हैं, लेकिन दिल में टूटा गठबंधन और कांग्रेस के खिलाफ गुस्सा है।
2021 में AIUDF और कांग्रेस ने 'महाजोट' के नाम पर एक साथ चुनाव लड़ा था। गठबंधन का लक्ष्य था मुस्लिम वोटों का बंटवारा रोकना। लेकिन चुनाव के बाद कांग्रेस ने हाथ छोड़ दिया। और फिर 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार रकीबुल हसन ने खुद बदरुद्दीन अजमल को उनकी ही ढुबरी सीट पर 10 लाख से अधिक वोटों से हरा दिया। यह सिर्फ एक loss नहीं — यह एक अपमान था।
अब अगले असम विधानसभा चुनाव में अजमल ने कांग्रेस को असली दुश्मन मान लिया है। मुस्लिम वोट बंटे — तो AIUDF का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। वहीं, मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का निशाना सीधे 'मियां मुसलमानों' पर है — बांग्लादेशी मूल के Bengali-speaking Muslims पर। उन्होंने साफ कहा है: 'मैं इनकी कमर तोड़ दूंगा।' यह आग बोलने वाली भाषा है, जिससे AIUDF के आधार पर डर की लहर दौड़ गई है।
अजमल का जवाब है: अगर बीजेपी फिर सत्ता में आई, तो 'मियां मुसलमान' असम में हावी हो जाएंगे। यह राजनीतिक भविष्यवाणी है, लेकिन तथ्य भी हैं। असम की 3.12 करोड़ की आबादी में 34 फीसदी Muslim population है। लेकिन असली बात यह है कि असम के मूल मुस्लिम समुदाय का हिस्सा सिर्फ 4 फीसदी है। बाकी वे हैं जिन्हें 'मियां' कहा जाता है। और ये 22 सीटों पर निर्णायक प्रभाव रखते हैं।
कांग्रेस अब अकेले चुनाव लड़ रही है, और तर्क यह है कि AIUDF के साथ गठबंधन असमिया बहुसंख्यक को दूर कर सकता है। लेकिन यही तर्क कांग्रेस के खिलाफ काम कर सकता है। क्योंकि मुस्लिम वोटर अब पूछ रहे हैं: कौन है जो सीधे हमारी बात करता है? AIUDF या कांग्रेस? अगर AIUDF कांग्रेस को कड़ी challenge देती है, तो मुस्लिम वोट टूट सकते हैं — और फिर फायदा BJP को होगा।
हालांकि, अजमल के पास अब नया हथियार है — राजनीतिक सहयोगी असदुद्दीन ओवैसी। AIMIM के नेता ने AIUDF का समर्थन किया है और जल्द प्रचार करने आ रहे हैं। यह strategic alliance अजमल के लिए जीवन-रक्षक साबित हो सकती है।
अगले चुनाव के बाद असम का राजनीतिक नक्शा बदल सकता है। अगर अजमल हारे, तो AIUDF को नए सिरे से खड़ा करना मुश्किल होगा। अगर कांग्रेस दोबारा 2024 जैसा performance करती है, तो वह फायदे में रहेगी। और अगर मुस्लिम वोट बंटे, तो BJP के लिए रास्ता खुल जाएगा। यह सिर्फ एक चुनाव नहीं — यह अस्तित्व के लिए लड़ाई है।
10 लाख वोटों का अंतर? ये सिर्फ हार नहीं, ये political rejection राजनीतिक अस्वीकृति है। क्या AIUDF अब आधार खो चुकी है?
मैं बंगाली भाषी मुसलमान हूं। हिमंता जी की बात सुनकर लगता है जैसे मैं illegal settler अवैध बसने वाला हूं। मैं असम में पैदा हुआ हूं। ये आघातक भाषा कब तक चलेगी?
2021 में कांग्रेस के साथ गठबंधन ने AIUDF को फायदा दिया, लेकिन 2024 में अकेले चुनाव लड़ने ने कांग्रेस को consolidated Muslim votes एकजुट मुस्लिम वोट दिलाए। अब सवाल ये है — क्या AIUDF फिर से प्रासंगिक खिलाड़ी बन पाएगी?
हिमंता बिस्वा सरमा बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर ठीक कह रहे हैं, लेकिन 'मियां मुसलमान' जैसे शब्द का इस्तेमाल करके पूरे समुदाय को target लक्ष्य बना रहे हैं। ये विभाजक राजनीति है।
ओवैसी साहब का AIUDF का समर्थन अच्छी खबर है। ये व्यापक मुस्लिम एकता की शुरुआत हो सकती है। अब देखना ये है कि क्या वे effective campaign प्रभावी अभियान चला पाते हैं।
बदरुद्दीन अजमल को कांग्रेस ने हरा दिया, न कि BJP। AIUDF का असली दुश्मन internal betrayal आंतरिक विश्वासघात है। BJP को फायदा तभी होगा जब विपक्ष आपस में लड़ेगा।
सच ये है कि अगर मुस्लिम वोट बंटे, तो बीजेपी जीतेगी। चाहे अजमल हो या कांग्रेस — जब तक एकजुट नहीं होंगे, regional parties क्षेत्रीय दल का अस्तित्व खतरे में है।
2005 में AIUDF बनी थी। तब कांग्रेस को significant loss भारी नुकसान हुआ था। अब 20 साल बाद, क्या इतिहास दोहराएगा? या अब कांग्रेस ने सबक सीख लिया है?