ऐसे तो वे सभी जज अयोग्य हो जाएंगे...; केजरीवाल के जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के बच्चों वाले दावे पर CBI

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से दिल्ली आबकारी नीति मामले की hearing से खुद को अलग करने की मांग की है। इसके पीछे का reason यह है कि जस्टिस शर्मा के बच्चे केंद्र सरकार के panel में वकील के तौर पर शामिल हैं। केजरीवाल का तर्क है कि इस संबंध के कारण उन्हें निष्पक्ष trial का right मिलना चुनौतीग्रस्त हो गया है।

इस पर सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में लिखित जवाब दायर कर कहा है कि अगर इस तर्क को मान लिया जाता है, तो देश के entire न्यायपालिका तंत्र पर ही impact पड़ेगा। एजेंसी का कहना है कि ऐसा मान लेने पर वे सभी जज अयोग्य हो जाएंगे जिनके relatives किसी भी सरकारी पैनल में हैं। इससे न केवल जजों की independence खतरे में पड़ेगी, बल्कि न्यायिक संसाधनों का भी बड़ा waste होगा।

सीबीआई ने केजरीवाल की अर्जी को एक tactic बताया है जो संस्था और न्यायाधीश पर pressure डालने के लिए चलाई जा रही है। एजेंसी का दावा है कि एक बार जब जज खुद को अलग कर लेंगे, तो यह एक खराब precedent कायम करेगा। भविष्य में कोई भी वादी बिना evidence के जज को हटाने के लिए सोशल मीडिया का use कर सकेगा।

इस मामले में पहले एक ट्रायल कोर्ट ने केजरीवाल और 22 अन्य आरोपियों को acquitted कर दिया था। सीबीआई ने उस फैसले को चुनौती दी, जिस पर अब जस्टिस शर्मा की बेंच सुनवाई कर रही है। 9 मार्च को उन्होंने ट्रायल कोर्ट के कुछ आदेशों पर stay लगा दी थी और इसे flawed भी बताया था। केजरीवाल का आरोप है कि इसी behavior से पक्षपात का suspicion पैदा होता है।

इस विवाद ने न्यायिक निष्पक्षता और व्यक्तिगत संबंधों के बीच की balance को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। एक तरफ जहां आरोपी को निष्पक्ष justice मिलना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर न्यायाधीशों की स्वतंत्रता पर किसी भी तरह के unfair दबाव को रोकना भी लोकतंत्र के लिए अहम है। यह मामला अब संस्थागत integrity की परीक्षा के रूप में उभर रहा है।

प्रतिक्रियाएँ 6

  • सच्चाईकीखोज

    अगर जज के बच्चे सरकारी पैनल में हैं तो भी क्या उनके judgment पर सवाल उठाना उचित है? न्यायाधीश की personal जिंदगी और उनका पेशेवर काम अलग होना चाहिए।

  • न्यायकामांगी

    केजरीवाल ने जो मांग की है, वह fair है। निष्पक्षता के लिए न सिर्फ न्याय होना चाहिए, बल्कि appear भी होना चाहिए।

  • संविधानभक्त

    सीबीआई का तर्क भी गलत नहीं है। अगर हर case में जज के रिश्तेदारों को लेकर आपत्ति उठाई जाएगी, तो court चलेगी कैसे?

  • जनताकीआवाज

    सोशल मीडिया का pressure बढ़ता जा रहा है। लेकिन क्या इसी के आधार पर जजों को डराया जाएगा? यह dangerous रुख है।

  • तथ्यवाला

    अगर ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया था, तो सीबीआई को उसके खिलाफ अपील क्यों करनी पड़ी? क्या जांच एजेंसी को ही truth पता है?

  • विचारक

    इस मामले में न तो जज को बदनाम करना चाहिए, न ही आरोपी को निष्पक्षता के अधिकार से वंचित। system को संतुलन बनाए रखना होगा।

यह लेख तथ्यों पर आधारित है और अंग्रेज़ी सीखने के लिए पुनर्रचित किया गया है; पाठक प्रतिक्रियाएँ विविध दृष्टिकोणों के उदाहरण हैं।

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