आजमगढ़ किसी का गढ़ नहीं: राजभर का सपा पर हमला और विकास का दावा
आजमगढ़ को लेकर अब कोई दावा नहीं कर सकता — यह संदेश साफ है। प्रदेश के पंचायती राज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी पर जमकर हमला बोला है, खासकर film 'धुरंधर' पर हुई टिप्पणियों को लेकर। उनका कहना है कि जब मुजफ्फरनगर में दंगे चल रहे थे, तब सैफई में नाच-गाना चल रहा था।
राजभर ने कहा कि आजमगढ़ किसी का गढ़ नहीं है। उनकी पार्टी — सुभासपा — यहां की सभी 10 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। गुरुवार को आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन में उन्होंने दावा किया कि सपा के कार्यकाल में दंगे और curfew आम थे, लेकिन योगी आदित्यनाथ के समय से उत्तर प्रदेश शांतिपूर्ण है।
राजभर ने पुराने दिन भी याद किए। जब वे, संजय चौहान, कृष्णा पटेल और जयंत चौधरी सपा में थे, तब अखिलेश यादव को 111 सीटें मिली थीं। लेकिन अब ये नेता सपा छोड़ चुके हैं और पार्टी weakened हुई है। उन्होंने दावा किया कि कई मुस्लिम नेता — खुर्शीद आलम, शाहिद आलम, मजीद — भी अब उनके साथ हैं।
लेकिन आरोप भी गंभीर हैं। राजभर ने कहा कि जिले में सपा के कई विधायक, एमएलसी और सांसद हैं, लेकिन उनकी निधि कहां जा रही है, पता नहीं। corruption का बोलबाला है और विकास कार्य दिखाई नहीं दे रहे।
इसी बीच, उन्होंने अपनी पहल के तहत सिकंदरपुर-नरियांव मार्ग की मरम्मत शुरू कराई, जो वर्षों से जर्जर था। उन्होंने एमएलसी और राज्यसभा सदस्यों से 10 करोड़ रुपये जुटाकर सड़कों का निर्माण कराया और poor people के इलाज में तीन करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए।
सवाल अब यह है कि आजमगढ़ का चुनावी मैदान किसका होगा। क्या सपा का पुराना दबदबा टूटेगा? क्या राजभर की स्थानीय पहल और political shift वोटर्स को प्रभावित कर पाएंगे? मैदान गरम है — और अब कोई भी जगह 'गढ़' नहीं रहने वाली।
सैफई में नाच-गाने की बात सच है या नहीं, पर जब जनता भूखी है तो राजनीति में 'नृत्य' बुरा लगता है। जनता के issues मुद्दे कहां हैं, यही सवाल है।
आजमगढ़ में भ्रष्टाचार सचमुच चरम पर है। प्रोजेक्ट तो शुरू हुए, लेकिन quality गुणवत्ता कहीं नहीं दिखती। जिम्मेदार कौन?
राजभर ने जो सड़क बनवाई, वो देखी है — smooth चिकनी है। अगर सच में गांव-गांव तक ऐसा काम हो, तो वोट बदल सकता है।
मुस्लिम नेताओं के आने की बात कर रहे हैं, लेकिन क्या वो समुदाय वाकई उनके साथ जाएगा? यही test असली परीक्षा है।
10 सीटें लड़ने का ऐलान तो तेज है, लेकिन संसाधन हैं क्या? election चुनाव तो धन और कार्यकर्ताओं पर चलता है।
इतना बोलना आसान है। लेकिन जब तक परिणाम नहीं आते, कोई claim दावा नहीं माना जाएगा।
जो मंत्री खुद आकर विकास का काम देखता है, वो difference अंतर जरूर करता है। भरोसा धीरे-धीरे बढ़ेगा।
तीन करोड़ में कितने मरीजों का इलाज हुआ? क्या receipts बिल जारी हुए? पारदर्शिता भी तो जरूरी है।